शंकर पांडे ( वरिष्ठ पत्रकार ) 
पिछले 11 वर्षों से देश में अजीबोगरीब ‘नामकरण उत्सव’ चल रहा है।विकास का दावा करने वाली मोदी सरकार ने असल में उन योजनाओं की री-ब्रांडिंग करने में अपनी पूरी ताकत लगा दी है, जिनकी नींव और रूपरेखा यूपीए सरकार (कांग्रेस शासन)के दौरान रखी गई थी। हाल ही में ‘मनरेगा’जैसी योजना का नाम बदलकर उसे ‘विकसित भारत-गारंटी’ (VB-G RAM G) की ब्रांडिंग देने की सुगबुगाहट फिर से वही सवाल खड़ा कर रही है.. हम विकास की ओर बढ़ रहे हैं या सिर्फ शब्दकोश बदल रहे हैं?हकीकत यह है कि ‘निर्मल भारत’ को ‘स्वच्छ भारत’ कह देने से,’इन्दिरा आवास’ को ‘प्रधानमंत्री आवास’ का टैग लगा देने से योजना का मूल उद्देश्य नहीं बदलता। लंबी फेहरिस्त उन कामों की है जिन्हें दशकों पहले शुरू किया गया था, लेकिन आज नए विज्ञापनों से ऐसा माहौल बनाया जा रहा है जैसे ये सभी ही पिछले 11 सालों की ही उपज हों। सवाल यह है कि अगर पिछली सरकारों ने कुछ नहीं किया,तो फिर उनकी ही लाई 28 से ज्यादा योजनाओं का नाम बदलकर चलाने की जरूरत क्यों पड़ी?असल में यह ‘काम’ से ज्यादा ‘नाम’ की राज नीति है। यह केवल क्रेडिट लेने की एक ऐसी होड़ है जिसमें सरकारी खजाने का करोड़ों ₹ सिर्फ नए विज्ञापनों, नए बोर्ड और नई ब्रांडिंग पर फूंक दिया जाता है। ताज्जुब यह है कि जिन योजनाओं को कभी विपक्ष में रहते हुए ‘विफलता का स्मारक’ कहा गया, आज उन्हीं का नाम बदलकर अपनी उपलब्धि बताया जा रहा है।यूपीए सरकार के समय की दूरदर्शी सोच और उन योजनाओं के ठोस आधार पर आज सिर्फ रंग-रोगन करके वाहवाही लूटी जा रही है।नाम बदलने की सनक में महापुरुषों के नाम इतिहास की किताबों और योजनाओं से मिटा देने से उनकी विरासत खत्म नहीं होती, लेकिन सत्ता की उस मानसिकता को जरूर दर्शाता है जहाँ काम से ज्यादा चमक-धमक और हेडलाइंस को प्राथमिकता दी जाती है। जनता को योजनाओं के संस्कृतनिष्ठ या भारी- भरकम नामों से सरोकार नहीं, उसे सरोकार है समय पर मिलने वाले लाभ, रोजगार और घटती महंगाई से।जब करोड़ों ₹ सिर्फ ‘री- ब्रांडिंग’ के जश्न में खर्च किए जाते हैं, तो वह पैसा सीधे तौर पर टैक्स भरने वाली जनता की जेब से जाता है,राजनीति का ‘नामकरण संस्कार’ शायद चुनावी रैलियों में वाह-वाही दिला दे,लेकिन क्या यह वास्तव में देश के बुनियादी ढांचे को मजबूत कर रहा है? केवल लिफाफा बदल देने से खत की इबारत नहीं बदलती। विकास विज्ञापनों में नहीं, जनता की खुशहाली में दिखना चाहिए।
रायपुर:अटलजी की आमसभा
का खर्च केवल 25 ₹..और अब ! 
भाजपा के वरिष्ठ नेता स्व.अटल बिहारी बाजपेयी की रायपुर में एक आमसभा हुई थी और कुल खर्च आया था मात्र 25 ₹…।आज तो उनकी ही पार्टी के लोग छोटे- छोटे कार्यक्रमों में लाखों खर्च कर देते हैं…?अविभाजित म.प्र. में ग्वालियर में पले-बढ़े अटलजी का छत्तीस गढ़ से यही नाता रहा कि वे जनसंघ के जमाने से यहां आते रहे यहां उनकी एक भतीजी की ससुराल भी है।1956-57 में अटलजी रायपुर आये थे वहीं 1960 में अटलजी की एक सभा गांधी चौक में हुई थी। तब 25 रुपये का खर्च आया था। भाजपा के वरिष्ठ नेता स्व.मनोहर रेड्डी एक बार उस सभा में उपस्थित भीड़, खर्च का हिसाब याद था। उस समय सवा ₹ के 4 पेट्रोमेक्स किराये पर लिये गये थे, 15 ₹ ही लाउडस्पीकर वाले को देना पड़ा था, 5 ₹ में दिन भर के लिए एक रिक्शा किराये पर लेकर अटलजी की सभा की खबर शहर में दी जाती रही थी।1968-69 में भी वे रायपुर आये थे। 1992 में ओडिशा जाते समय वे कुछ देर सर्किट हाऊस (आजकल राजभवन) में रूके थे। उसी समय उन्होंने दूधाधारी मंदिर में दर्शन किया, बीमार महंत वैष्णवदास से मुलाकात की,100 रुपये का दान भी मंदिर को दिया था। वैसे1980 के आसपास भी अटलजी का रायपुर आगमन हुआ था तब रक्तदान शिविर का आयोजन हुआ था और हमने भी बतौर छात्रनेता रक्तदान किया था तब दुर्गा कालेज में एक कार्यक्रम भी हुआ था। जिसमें तब के प्राचार्य रणवीरसिंह शास्त्री शामिल नहीं हुए थे। तब शास्त्रीजी ने कहा था कि राजनीतिज्ञों का शिक्षण संस्थाओं में प्रवेश उचित नहीं है। बाद में शास्त्रीजी कांग्रेस की राजनीति में शामिल हो गये। तब बतौर पत्रकार हमने उनसे पूछा था अब आप का राजनीतिज्ञों के बारे में क्या कहना है तो जवाब दिया था मैंने अपना सिद्धांत बदल दिया है?…खैर कालांतर में अटलजी पीएम बने तब सप्रे शाला के मैदान में आमसभा में छग की जनता से अपील की यदि लोकसभा की सभी 11 सीटें भाजपा को मिलती है तो पृथक छत्तीसगढ़ राज्य बनाया जाएगा यह ठीक है कि उस चुनाव में भाजपा को लोस में केवल 7 सीटों पर संतोष करना पड़ा।कांग्रेस के अजीत जोगी (रायगढ़) श्यामाचरण शुक्ल (महास मुंद), डॉ. चरणदास महंत (जांजगीर) तथा खेलसाय सिंह (सरगुजा) से विजयी रहे।चुनाव में कांग्रेस के दिग्गज नेता मोतीलाल वोरा जरूर भाजपा के डॉ. रमन सिंह से पराजित हो गये।राजनांदगांव से डॉ. रमन पहली बार सांसद बने थे, अटलजी ने अपना वादा निभाया, एक नवंबर 2000 को छत्तीसगढ़, झारखंड तथा उत्तराखंड को नया राज्य घोषित किया गया। छत्तीस गढ़ ऐसा राज्य रहा जहां पहले 3 साल कांग्रेस तथा बाद के स्थिर सरकार भाजपा की बनी है वहीं लोक सभा में भी 10 लोस में भाजपा का लगातार परचम लहराता आ रहा है। वैसे अटलजी, चूंकि छत्तीसगढ़ की हकीकत से परिचित थे इसीलिए उन्होंने म.प्र.से विभाजित कर पृथक छत्तीसगढ़ की न केवल स्थापना की बल्कि छग के विकास के लिए भी हमेशा तत्पर रहे। उनके प्रधानमंत्रित्व काल में छत्तीसगढ़ जैसे छोटे राज्य से 3 साँसदों को केन्द्रीय मंत्रिमंडल में शामिल किया। सर्वश्री रमेश बैस,स्व.दिलीप सिंह जूदेव,डॉ. रमनसिंह को राज्यमंत्री के रूप में शामिल किया। डॉ. रमन सिंह तो पहली बार ही लोकसभा सदस्य बने थे। यही नहीं राज्य बनने के बाद भी अटलजी छत्तीसगढ़ आते रहे।2004 में छग के चौथे राज्योत्सव में भी वाजपेयीजी ने आकर शिरकत की। राजनीति में ऐसे लोग बिरले ही होते हैं जो जनता के दिलों में तो राज करते हैं वहीं विपक्षी ने्ता भी उन्हें पसंद करते हैं। अटलजी की भाषण की शैली में संगीत, लय, ताल, व्यंग्य, गंभीरता, कविता, इतिहास, भूगोल, वर्तमान, भविष्य सभी का समावेश होता था तभी तो उनकी सभा में उन्हें सुनने ही लोग स्व: स्फूर्त ही जुट जाया करते थे। एक बार अटलजी ने तब की पीएम इंदिरा गांधी को दुर्गा का अवतार कहा था तो डॉ. मनमोहन सिंह ने उद्बोधन में अटलजी को राजनीति का भीष्म पितामह कहा था। देश के पहले पीएम नेहरू ने भी युवा अटल को देखकर उनके भावी पीएम की भविष्यवाणी करने की भी जमकर चर्चा रही।
छ्ग लोक भवन का
एक आदेश चर्चा में….
छ्ग में शासकीय विश्वविद्यालयों में अब किसी अधिकारी, शिक्षक या कर्मचारी के खिलाफ जांच शुरू करने से पहले राज्यपाल की अनुमति अनिवार्य हो गई है। जांच पूरी होने के बाद अंतिम निर्णय लेने के लिए कुलाधिपति की स्वीकृति जरूरी होगी। इस संबंध में लोक भवन से आदेश जारी कर दिए गए हैं। बता दें कि इस आदेश के बाद राज्यपाल और राज्य सरकार के बीच अधिकारों को लेकर टकराव की स्थिती पैदा हो गई है।दरअसल अब तक विश्वविद्यालयों में कुलपति स्तर तक राज्यपाल के अधिकार क्षेत्र में रहा है। इसके बाद के अधिकारियों से जुड़े मामलों में राज्य सरकार निर्णय लेती है, नई व्यवस्था के तहत कुलसचिव या प्रभारी कुलसचिव के अलावा अब किसी भी अधिकारी, शिक्षक, कर्मचारी के खिलाफ जांच शुरू करने से पहले राज्यपाल से अनुमति लेना जरूरी हो गया है।
विस सचिव को एक
साल की सेवा वृद्धि.. 
छत्तीसगढ़ विधानसभा के सचिव दिनेश शर्मा का कार्यकाल 1साल बढ़ा दिया गया है, उनका कार्यकाल 30 नवम्बर 25 को समाप्त हो रहा था पऱ 1साल की सेवा वृद्धि के बाद 30 नवम्बर 26 तक इस पद पऱ बने रहेंगे। वैसे डॉ चरणदास महंत के विस अध्यक्ष कार्यकाल में इस मूल छत्तीसगढ़िया को सचिव बनाया गया था।मूलत: जांज गीर जिले के रहने वाले दिनेश शर्मा को ही सेवावृद्धि नहीं मिली है, इसके पहले देवेंद्र वर्मा, चंद्रशेखर गँगराडे को भी बतौर सचिव सेवा वृद्धि मिली थी।
नरेश शर्मा, जांजगीर अधिवक्ता संघ
के पाँचवी बार अध्यक्ष बने….. 
जिला अधिवक्ता संघ जांज गीर के अध्यक्ष पद पऱ पाँचवी बार नरेश शर्मा विजयी रहे। कुल 519 अधिवक्ताओं ने मतदान किया जिसमें नरेश शर्मा को 363 मत मिले और वे 250 मतों से विजयी रहे, नरेश शर्मा,ज़ब छत्तीसगढ़ में एकमात्र रविशंकर विश्व विद्या लय था तब दबंग छात्रनेताओं में एक रहे,अभी उम्र के इस पड़ाव में भी उनकी दबंगता क़ायम है।आज भी दीन-हीन की सेवा में वे तत्पर रहते हैं, कांग्रेस-भाजपा के बड़े नेताओं से उनका घरोबा है।
और अब बस
0 छ्ग के शराब घोटाले के आरोपी, पूर्व सीएम भूपेश बघेल के बेटे चैतन्य बघेल की छ्ग हाईकोर्ट से जमानत मिल गई है।
0 23 जनवरी 26 से रायपुर में पुलिस आयुक्त प्रणाली शुरू होगी।
0शराब घोटाले में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) दो साल की जांच के बाद तीन शराब कंपनियों के साथ अधिकारी -कारोबारियों की 382 करोड़ ₹ से अधिक की संपत्ति भी अटैच कर चुकी है।
*{कॉलम 20 सालों से लगातार}

