आज एक बहुत ही दुख भरी सूचना आई, हमारे बड़े भाई तुल्य राजेंद्र तिवारीका आज निधन हो गया। 78 साल की आयु में वे हम सभी को छोड़कर चले गये। सुबह मैं कुछ अफसरों से मिलने मंत्रालय गया हुआ था। जैसे ही तिवारी जी के देहांत की सूचना मिली, फिर किसी से मेल-मुला कात में मन नहीं लगा और नया रायपुर से सीधे टैगोर नगर स्थित उनके निवास पर पहुंच गया।
यूनियन बैंक के पूर्व वरिष्ठ प्रबंधक,अर्बन मार्केँटाईल बैंक के पूर्व सीईओ रहे तिवारीजी से मेरा परिचय अर्बन बैँक में कार्यभार सम्हालने के बाद हुआ। धीरे-धीरे ऐसे संबंध बन गये, जैसे एक ही परिवार का हिस्सा हों। उन्होंने बड़े भाई का प्यार ही नहीं दिया आर्थिक सलाह भी दी, मार्ग दर्शन भी किया।
कुछ साल तो सिलसिला यूं चला कि हम दोपहर का भोजन भी बैंक में साथ साथ करते थे। उनसे कई विषयों में लम्बी बातचीत होती थी। फिर हर रविवार को शाम 2 घंटे सदरबाजार में डॉ अशोक पारख के घर बैठते थे। साथ में तिवारी जी के स्कूल के सहपाठी सीए बेगानीजी,भंसाली ज्वेलर्स के भंसालीजी आदि भी बैठा करते थे। वहाँ भी दीन-दुनिया, राजनीति की बातें होती थी। डॉ अशोक पारख के निधन के बाद यह सिलसिला कुछ कम जरूर हुआ,पर मुलाकात का दौर चलता ही रहा।
वैसे कम ही लोग जानते हैं तिवारीजी का छत्तीसगढ़ के बड़े राजनीतिक परिवार से निकट का नाता था। सीपी एंड बरार और मप्र के पहले सीएम पं. रविशंकर शुक्ला की सगी बहन तिवारीजी की दादी थीं। श्यामाचरण, विद्याचरण शुक्ला उनके मामा थे। यह बात और है कि तिवारीजी यह रिश्ता बताने से गुरेज रखते थे। पं रविशंकर शुक्ल रविशंकर विश्वविद्यालय के कुलपति जगदीश चंद्र दीक्षित भी उनके करीबी रिश्तेदार थे।
तिवारीजी ने अपनी जिंदगी ‘सादा जीवन उच्च विचार’ की तर्ज पर ही गुजारी।अपनी शर्तों में नौकरी की, कभी भी परिस्थितियाँ उन पर हावी नहीं होसकी,उनके साथ काम करने वाले लोग आज उनकी कार्यप्रणाली की तारीफ करते हैं।
दो बच्चियों के पिता राजेंद्र प्रसाद तिवारी न केवलदोनों के लिये आदर्श हैं, दोनों दामादों के भी काफ़ी निकट थे। बहरहाल जो आता है, उसे जाना ही होता है…यह कटु सत्य है, यह प्रकृति का घोषित नियम भी है… पर किसी आत्मीय के जाने का दुख तो होता ही है।
एक मित्र, एक बड़े भाई, एक शुभचिंतक, मार्गदर्शक व सलाहकार के जाने का दुख वर्णन से परे है। आदर णीय तिवारी जी को विनम्र श्रद्धांजलि…सादर नमन। ( शंकर पांडे ) वरिष्ठ पत्रकार

