पानी कभी किसी एक का नहीं होता। वह तो बादल से उतरकर धरती में समाता है, कुएं में ठहरता है, तालाब में सोता है, और फिर किसी न किसी बहाने पूरे गांव के काम आता है। यह बात छत्तीसगढ़ के लोग भूले नहीं थे, बस थोड़ी धूल जम गई थी , 24 अप्रैल 2025 को, पंचायती राज दिवस के दिन, इसी धूल को झाड़ने का काम शुरू हुआ। नाम रखा गया- “मोर गांव, मोर पानी”।
यह कोई ऐसी योजना नहीं है जो दफ्तर में बनी और गांव में उतार दी गई। इसकी बुनावट उलटी है। यहां गांव ने बताया कि उसे क्या चाहिए, और काम उसी हिसाब से हुआ। बड़े बांध नहीं, बड़ी मशीनें नहीं, बड़े ठेके नहीं। छोटे-छोटे डबरी, तालाब, मेड़, बांधान – जैसे दादा-परदादा बनाया करते थे, वैसे ही, पर आज के हाथों से। मनरेगा / वी बी जी राम जी के मजदूरों ने अपने गांव की धरती पर अपने गांव का पानी रोका। आंकड़ा बताता है कि 33 जिलों में अब तक दो हजार करोड़ रुपये से अधिक खर्च करके एक लाख तीन हजार छह सौ इक्यावन ऐसे काम मंजूर हो चुके हैं। कबीरधाम, बिलासपुर, बालोद जैसे जिले सबसे आगे रहे, पर नारायणपुर और सुकमा जैसे कठिन इलाके भी इस यात्रा से अछूते नहीं रहे। पानी किसी सीमा को नहीं मानता, न इस अभियान ने माना।
नाम भी देखिए कितने अपने से हैं – “नवा तरिया, आय के जरिया”, “आजीविका डबरी”, “आवा पानी झोखो”। ये शब्द किसी फाइल से नहीं, गांव की बोली से निकले हैं। जब भाषा अपनी होती है, तो काम भी अपना लगने लगता है। लोग इसे सरकार का काम नहीं, अपने आंगन का काम मानने लगे।
पुराना ज्ञान यहां नई तकनीक से हाथ मिलाता दिखा। एक ओर बुजुर्गों का वह हिसाब है जो बताता था कि पानी कहां रुकेगा, कहां बहेगा। दूसरी ओर युक्तधारा पोर्टल और क्लार्ट जैसे ऐप हैं, जो उसी बात को विज्ञान की भाषा में कहते हैं। “जलदूत” नाम की एक व्यवस्था अब कुओं का जलस्तर नापती है, और पंचायत भवन की दीवार पर वह आंकड़ा लिख दिया जाता है – जैसे गांव अपने पानी का हिसाब-किताब खुद रखने लगा हो। हर पंचायत में एक क्यूआर कोड भी लगा है, जिसे मोबाइल पर टिकाकर कोई भी देख सकता है कि उसके गांव में पानी का कौन सा काम हुआ, कितने में हुआ। पारदर्शिता के लिए इससे सीधा रास्ता और क्या होगा , सबकी जानकारी – सबकी निगरानी प्रणाली ।
पानी बचाना ही काफी नहीं था, इसलिए इस अभियान ने पानी को कमाई से भी जोड़ा। पंद्रह हज़ारसे अधिक “आजीविका डबरी” अकेले उन परिवारों की जमीन पर बनी हैं, जो अब तक हाशिये पर खड़े थे – आदिवासी, महिलाएं, और विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह। इन डबरियों में अब मछली पलती है, किनारे सब्जी उगती है। सात सौ से अधिक सामुदायिक तालाब स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं के हवाले हैं, जो अब पानी की रखवाली भी करती हैं और उसकी कमाई भी बांटती हैं। प्रधानमंत्री आवास योजना के डेढ़ लाख से अधिक घरों में लोगों ने अपने खर्च से वर्षा जल संचयन लगवा लिया, किसी ने कहा नहीं, उन्होंने खुद समझा।
इस पूरी यात्रा में एक बात सबसे गहरी है। मनरेगा / वी बी जी राम जी के जरिए हर दिन हजारों , लाखो हाथों को काम मिल रहा है, और इनमें आधे से अधिक हाथ महिलाओं के हैं। यानी जो पानी कभी सिर पर ढोया जाता था, अब वही पानी महिलाओं के हाथों में मजदूरी और मान दोनों लेकर आ रहा है , और इस सबका असर धरती के भीतर भी दिखने लगा है। कुछ साल पहले तक प्रदेश में पांच विकासखंड ऐसे थे, जहां भूजल इतना गिर चुका था कि उन्हें “क्रिटिकल” कहा जाता था, बेमेतरा जिले के तीन विकासखंड, और धरसीवा व गुरूर। अभियान के बाद अब वहां एक भी क्रिटिकल विकासखंड नहीं बचा। जो इक्कीस विकासखंड “सेमी-क्रिटिकल” की सूची में थे, वे घटकर उन्नीस रह गए हैं। यह कोई छोटी बात नहीं। भूजल की तस्वीर वर्षों में बदलती है, महीनों में नहीं। इतने कम समय में यह बदलाव दिखना बताता है कि जो पानी गांव-गांव में रोका गया, वह सचमुच धरती के भीतर उतरा भी।
पुराने समय में गांव अपने तालाब खुद खोदते थे, खुद संभालते थे। बीच में यह समझ कहीं खो गई थी कि पानी की जिम्मेदारी गांव की अपनी है। “मोर गांव, मोर पानी” उसी पुरानी समझ को नए ढंग से लौटा लाया है। यह केवल जल संरक्षण की योजना नहीं, बल्कि यह याद दिलाने का प्रयास है कि जब गांव अपने पानी को अपना मान लेता है, तो पानी भी गांव का हो जाता है- बरसों तक, पीढ़ियों तक।
– तारन प्रकाश सिन्हा (छत्तीसगढ़ शासन में वरिष्ठ आईएएस अधिकारी हैं।)