बुद्ध को पढ़ना केवल एक महापुरुष का जीवन पढ़ना नहीं, बल्कि स्वयं के भीतर उतरने की एक आध्यात्मिक यात्रा है। बुद्ध के जीवन और उनके दर्शन को कथा के सूत्र में बाँधना अत्यंत कठिन कार्य है, क्योंकि उनका व्यक्तित्व किसी एक विचार, मत या तर्क में सीमित नहीं किया जा सकता। उनका संपूर्ण जीवन करुणा, सत्य, अहिंसा और आत्मबोध का सजीव उदाहरण है।
बुद्ध के जीवन को समझने का सबसे सुंदर माध्यम उनके जीवन की घटनाएँ हैं। राजकुमार सिद्धार्थ से बुद्ध बनने तक की यात्रा केवल एक व्यक्ति की यात्रा नहीं, बल्कि समस्त मानवता के मोह, दुःख, प्रश्न और मुक्ति की यात्रा है। संसार के वैभव, सुख-सुविधाओं और राजसी ऐश्वर्य के बीच भी जब उनका मन नहीं ठहरा, तब उन्होंने जीवन के उस सत्य की खोज प्रारंभ की जो जन्म, जरा, रोग और मृत्यु के पार ले जाता है।
महाराज शुद्धोधन के लिए वह अत्यंत सुखद क्षण था जब राजकुमार सिद्धार्थ ने राजकुमारी यशोधरा का वरण करने हेतु आयोजित प्रतियोगिता में भाग लेने की सहमति दी। उन्हें लगा कि विवाह का बंधन सिद्धार्थ को सांसारिक जीवन से जोड़ देगा। यद्यपि सिद्धार्थ ने प्रतियोगिता में विजय प्राप्त की और यशोधरा से विवाह भी किया, परंतु उनका मन वैभव और भोग-विलास में कभी नहीं रमा। उनका अंतर्मन किसी और सत्य की खोज में व्याकुल था।
यशोधरा का प्रेम भी अद्भुत था। उन्होंने अपने हृदय से सिद्धार्थ को जीवनसाथी स्वीकार किया था। किंतु नियति को कुछ और ही मंजूर था। जिस राजकुमार के साथ उन्होंने आजीवन साथ निभाने के स्वप्न देखे थे, वही एक दिन समस्त सांसारिक संबंधों का त्याग कर मानवता के कल्याण के लिए महाभिनिष्क्रमण का मार्ग चुन लेगा, यह किसी ने नहीं सोचा था। यही जीवन का सबसे बड़ा सत्य है कि मनुष्य योजनाएँ बनाता है, किंतु समय अपना निर्णय स्वयं लिखता है।
सिद्धार्थ के जीवन में निर्णायक मोड़ तब आया जब उन्होंने पहली बार एक वृद्ध, एक रोगी, एक मृतक और एक शांत संन्यासी को देखा। इन चार दृश्यों ने उनके मन को भीतर तक झकझोर दिया। उन्हें अनुभव हुआ कि यौवन, स्वास्थ्य और वैभव क्षणभंगुर हैं। यदि जीवन का अंत मृत्यु ही है, तो मनुष्य का वास्तविक उद्देश्य क्या है? यही प्रश्न उनके वैराग्य का आधार बना।
एक रात्रि, जब समस्त राजमहल निद्रा में था, सिद्धार्थ ने सोते हुए राहुल और यशोधरा को अंतिम बार देखा। उनके हृदय में मोह था, किंतु मानवता के कल्याण का संकल्प उससे भी बड़ा था। अपने प्रिय अश्व कंथक और सारथी छन्ना के साथ उन्होंने राजमहल का त्याग किया। इतिहास ने इस घटना को महाभिनिष्क्रमण के नाम से अमर कर दिया।
इसके पश्चात उन्होंने वर्षों तक कठोर तपस्या की। शरीर इतना क्षीण हो गया कि अस्थियाँ तक दिखाई देने लगीं। तब उन्हें अनुभव हुआ कि न तो भोग का मार्ग सत्य है और न ही शरीर को अत्यधिक कष्ट देने का। उसी समय ग्रामवधू सुजाता ने उन्हें श्रद्धापूर्वक खीर अर्पित की। उस प्रसंग ने सिद्धार्थ को जीवन का एक और महान सत्य सिखाया—अति हर स्थिति में त्याज्य है, मध्यम मार्ग ही श्रेष्ठ है।
बोधगया में पीपल के वृक्ष के नीचे ध्यानस्थ होकर उन्होंने संकल्प लिया कि जब तक सत्य का साक्षात्कार नहीं होगा, तब तक वे उठेंगे नहीं। अंततः वैशाख पूर्णिमा की पावन रात्रि में उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई और राजकुमार सिद्धार्थ, गौतम बुद्ध बन गए। उस क्षण केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि समस्त मानवता के एक नए युग का जन्म हुआ।
ज्ञान प्राप्ति के पश्चात बुद्ध ने सारनाथ के मृगदाव में अपने पाँच पूर्व साथियों को प्रथम उपदेश दिया। इसे धर्मचक्र प्रवर्तन कहा गया। उन्होंने संसार को चार आर्य सत्य, अष्टांगिक मार्ग, करुणा, मैत्री, अहिंसा और मध्यम मार्ग का संदेश दिया। उनका धर्म किसी संप्रदाय की स्थापना नहीं, बल्कि मनुष्य को स्वयं से जोड़ने का मार्ग था।
बुद्ध का व्यक्तित्व केवल उपदेशों तक सीमित नहीं था। अंगुलिमाल जैसा भयानक डाकू उनकी करुणा से परिवर्तित होकर भिक्षु बन गया। वैशाली की नगरवधू आम्रपाली ने भी उनके सान्निध्य में जीवन का नया अर्थ पाया। उन्होंने जाति, वर्ण, ऊँच-नीच और बाहरी आडंबरों का विरोध करते हुए मानव मात्र को समान दृष्टि से देखने का संदेश दिया। उनके लिए मनुष्य की श्रेष्ठता जन्म से नहीं, बल्कि उसके कर्म और चरित्र से निर्धारित होती थी।
जब बुद्ध का धर्म और दर्शन जन-जन तक पहुँचा, तब उसका अनेक स्थानों पर विरोध भी हुआ। अनेक मतों और परंपराओं ने उनके विचारों का प्रतिरोध किया, किंतु बुद्ध कभी विचलित नहीं हुए। उन्होंने किसी से वैर नहीं किया, किसी पर आक्रमण नहीं किया। वे केवल सत्य, करुणा और प्रेम के साथ निरंतर आगे बढ़ते रहे। यही उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी शक्ति थी।
अस्सी वर्ष की आयु में कुशीनगर में उन्होंने महापरिनिर्वाण प्राप्त किया। अंतिम क्षणों में भी उन्होंने अपने शिष्यों से कहा—”अप्प दीपो भव” अर्थात “स्वयं अपना दीपक बनो।” यह संदेश आज भी मानव जीवन का पथप्रदर्शक है।
बुद्ध को समझना तर्कों से अधिक संवेदना का विषय है। उनके जीवन को पढ़ने के बाद अपने आसपास फैली हिंसा, घृणा, छल, स्वार्थ और असत्य और भी अधिक स्पष्ट दिखाई देने लगते हैं। तब अनुभव होता है कि बुद्ध आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं, जितने ढाई हजार वर्ष पूर्व थे।
बुद्ध होना सरल नहीं है। राजकुमार सिद्धार्थ का बुद्ध बनना त्याग, तप, करुणा और आत्मबोध की वह यात्रा है, जिसे युगों-युगों तक मानवता श्रद्धा के साथ स्मरण करती रहेगी। जितना अधिक बुद्ध को पढ़ते हैं, उतना ही अनुभव होता है कि उन्हें पूरी तरह शब्दों में बाँध पाना संभव नहीं; उन्हें केवल पढ़ा नहीं, जिया और हृदय से अनुभव किया जा सकता है।
संजय अवस्थी ( लेखक एक समाजसेवी हैं। ये उनके निजी विचार हैं। )