जब किसी के घर आपको 105 वर्ष पुरानी लाइब्रेरी मिल जाये.. - Janmantra

जब किसी के घर आपको 105 वर्ष पुरानी लाइब्रेरी मिल जाये..

   प्रियंका कौशल                                                                          ( वरिष्ठ पत्रकार के fb वॉल से साभार) 

रायपुर। दिनेश यदु, छत्तीसगढ़ के एक छोटे से शहर बलौदाबाजार में रहते हैं और पेशे से वकील हैं। कांग्रेस के जिलाध्यक्ष भी हैं। लेकिन इनकी सबसे बड़ी खासियत है इनकी 105 वर्ष पुरानी ‘पुश्तैनी’ लाइब्रेरी। जो कानून की किताबों से सुसज्जित है। #लाइब्रेरी भी पुश्तैनी हो सकती है, ये दिनेश जी के घर जाकर पता चला। #वकालत को समर्पित यदु जी अपने खानदान की तीसरी और उनके बच्चे चौथी पीढ़ी का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।  

दिनेश जी के #पुस्तकालय में #प्रिवी कौंसिल से लेकर #AIR लाहौर ,सिंध,मद्रास, नागपुर से लेकर मप्र/छग जैसे राज्यों के न्यायलयीन फैसलों से संबंधित कानूनी किताबें हैं। सन्दर्भ की किताबें इतनी कि पिता जी के ज़माने से कई न्यायाधीश इनके निजी पुस्तकालय का लाभ लेते रहे हैं। इतना ही नहीं उनकी इस लाइब्रेरी में पिछली तीन पीढ़ियों के फर्नीचर भी बिलकुल जस के तस हैं। दिनेश जी की अर्धांगिनी सविता जी भले ही वकील ना हों, लेकिन अपने पुस्तकालय की एक-एक किताब की जानकारी रखती हैं। 

तस्वीर में सविता जी जिस मेज के पास खड़ी हैं, वो उनके दादा ससुर की है। उनके लाइब्रेरी में कई फर्नीचर भी तीन पीढ़ी पुराने हैं। लेकिन खास देखभाल जे कारण वे खराब नहीं हुए हैं। श्री दिनेश यदु के तीन बच्चे हैं। दो बेटियां व एक बेटा, तीनों ही उच्च शिक्षित हैं। इनमें से दो बच्चे तो वकालत की पढ़ाई कर अपने दादा की विरासत को आगे ले जाने की तैयारी कर रहे हैं।  

दिनेश यदु के दादा जी कन्हैया लाल यदु भी वकील थे। उनका जन्म 1883 में हुआ था। उन्होंने लखनऊ से उच्च शिक्षा प्राप्त की और लखनऊ व रायपुर में वकालत करते रहे। वे समाजसेवा और जाति सेवा भी बढ़चढ़कर करते थे। अखिल भारतीय यादव महासभा की अखिल भारतीय कमेटी में मध्य भारत से सदस्य थे। 1925 में छपरा अधिवेशन के अध्यक्ष रहे। इस अधिवेशन में फौज के उच्च पदों पर यादव की भर्ती का प्रस्ताव पारित किया गया। 1928 में कलकत्ता (अब कोलकाता) अधिवेशन में श्री कन्हैया यदु महासभा के महामंत्री चुने गए।

दिनेश यदु के पिता श्री कृष्णकुमार यदु भी नामी वकील रहे हैं। उनके बारे में कहा जाता है कि बड़े-बड़े जज उनकी सलाह लेने उनके घर आते रहे। कई बार वे ऐसे फैसलों में भी सलाह देते थे, जिसमें वे खुद भी दूसरे पक्ष की तरफ से पैरवी कर रहे होते थे। ये उनकी उदारता और ज्ञान को भी परिलक्षित करता है।

दिनेश यदु बताते हैं कि उनकी इस लाइब्रेरी में मौजूद रेफरेंस का लाभ उनके समकालीन वकील व जज भी उठाते थे। वे इतने उदार थे कि कभी उन्होंने इस बात का घमंड नहीं किया।

उनकी बहू सविता जी बताती हैं कि वे चाहते थे कि घर की महिलाएं भी पढ़ने-लिखने में सहभागिता निभाये। वे हमें लिखने पढ़ने के लिए प्रेरित करते थे। हम बहुओं को अखबारों में आने वाली अधूरी कहानी को पूरी करने वाली स्पर्धाओं में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करते थे। इतना ही नहीं कभी रामायण की चौपाई तो कभी गीता भी कंठस्थ कराते थे। उनकी ही प्रेरणा थी कि हमारा परिवार पूरे इलाके में आदर्श परिवार माना जाता था।  

यदु परिवार में 18 गजेटेड ऑफिसर, इंजीनियर, शिक्षाविद व न्यायविद हैं। परिवार की महिलाएं भी उच्च शिक्षा प्राप्त करके डॉक्टर, शिक्षक, एनसीसी कमांडर के पदों की शोभा बढ़ा रही हैं।

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