छ्ग के आदिवासी जननायक, क्रांतिवीर नारायणसिंह की शहादत…

{किश्त 233 }

सन 1857 की क्रांति राष्ट्र व्यापी थी,इसका प्रभाव क्षेत्र न केवल दिल्ली,लख नऊ,मेरठ, ग्वालियर, नाग पुर, इन्दौर,सतारा, झांसी जैसे ठेठ हिन्दी प्रदेश ही थे अपितु उड़ीसा का संबलपुर और छत्तीसगढ़ का रायपुर, उसके अन्तर्गत सोनाखान भी था। पूर्व में छत्तीसगढ़ का भू-भाग दक्षिण कोशल नाम से विख्यात था,मध्य काल में रत्नपुर राज्य कह लाता था,’जहांगीरनामा’के अनुसार रत्नपुर के राजा कल्याण साय,दिल्ली दर बार में 6 महीने के लिये नजर कैद थे।मराठा युग में 36 गढ़ों के आधार पर ही नाम छत्तीसगढ़ पड़ा था..!रत्नपुर, छत्तीसगढ़ राज्य मराठायुग के पूर्व सशक्त और संगठित राज्य था,सन 1490 के लगभग रत्नपुर के राजा बहरसाय ने सैन्य सेवा के एवज में आदिवासी नेता बिसई ठाकुर विंझवार को सोनाखान की जमींदारी प्रदान की थी, सन 1818 में तृतीय मराठा युद्ध की समाप्ति पर अंग्रेजों के प्रशा सनिक नियंत्रण में आ गया था, सोनाखान के लोकप्रिय जमींदार रामराय, साहसी और शक्तिशाली थे, सूबेदार की जगह रामराय का ही आदेश माना जाता था,यह अंग्रेज शासकों को रास नहीं आया,वे छल-बल से अपने नियंत्रण में रखना चाहते थे।वर्ष 1819 में कैप्टन मेक्सन की सेना से पराजित होने पर सोनाखान जमींदारी की शक्ति 300 ग्रामों से घटा लगभग 50 गांवों तक सीमित कर दी गई।जमींदार रामराय की मृत्योपरांत 35 वर्षीय पुत्र नारायण सिंह ने जमींदारी सम्हाली थी, वे धर्मप्राण, प्रजा वत्सल थे ,सोनाखान से लगी पहाड़ी पर अपने ग्राम देवता की नियमित पूजा करते थे ।उसने जनता के हित में बड़े-बड़े कार्य किये।राजासागर,रानीसागर नन्दसागर जैसे बड़े जला शय आज गौरव गाथा के साक्ष्य हैं,7 मार्च 1854 को ब्रिटिश शासन में नागपुर को विलय करने के बादछग के प्रशासन के लिए एक डिप्टी कमिश्नर के रूप में कैप्टन इलियट पदस्थकिया गया, मुख्यालय रायपुर था, 1856 में छग में बस्तर भी शामिल था। प्रशासनिक सुविधा की दृष्टि से छत्तीस गढ़ को रायपुर,धमतरी, बिलासपुर तीन तहसीलों में बांट दिया गया,1956 का अकाल छग में अनेक कहा वतों जन-कथा का जन्म दाता बन गया।इस भीषण अकाल में लोग कंद-मूल के भी खत्म होने पर पत्तियाँ खाने को विवश हो गये, भूखमरी,पानी के अभाव में बड़ी जन-पशु धन की हानि हो रही थी, नारायण,भीषण जनसंहार से अत्यधिक भावुक हो गए, एक दिन उनकी रैय्यत बड़ी संख्या में सोनाखान में इकत्र हुई,तब उनका मकान बांस,मिट्टियों का था,प्रजा सेवा में स्वयं का खजाना तक खाली हो गया था,ऐसे समय नारायण सिंह के नेतृत्व में लोग बड़ी संख्या में करौंद गांव के माखन नामक व्यापारी का गोदाम अनाज से भरा हुआ था,नारायण सिंह ने गरीब वेबस किसानों के हित में खाने को अन्न, बोने कोबीज मांगा,जिसे फसल आने पर बाढ़ी सहित लौटाने कीबात भी की,परन्तु व्यापारी दिल नहीं पसीजा,उल्टे जमींदार को दुत्कार दिया,यह चोट स्वाभिमानी नारायण सिंह के लिये असहनीय थी, उस ने अपना खांड़ा निकाला और गोदाम का ताला तोड़ कर अनाज भूखे किसानों में बांट दिया,विधिवत सका रण सूचना डिप्टी कमिश्नर को भेज दी,यह 29 अगस्त 1856 को घटना है,इलियट तो मौके की फिराक में था, व्यापारी की लिखित शिका यत पर नारायणसिंह के विरुद्ध कार्यवाही शुरू कर दी,पुलिसने नारायण सिंह को गिरफ्तार करने गयी, वे जगन्नाथ के तीर्थ यात्रा पर हैं,नारायण सिंह को बीच रास्ते में ही संबलपुर में 24 अक्टूबर1856 को बंदी
बना लिया गया,उन्हें डाका, हत्या के झूठे आरोप में राय पुर के जेल में बंद कर दिया गया। जनता इस घटना से भड़क उठी, नारायण सिंह 10 महीने 4 दिन तक जेल में बंद रहे,बाद में विद्रोही सैनिकों की मदद से दीवार में की गई सुरंग से जेल से भाग निकले।इधर देश में क्रांति की ज्वाला फूट पड़ी थी,झांसी की रानी दिल्ली के अन्तिम मुगल बादशाह बहादुर शाह आदि के खूनी संघर्ष की बात मध्यभारत में भी फैल भी रही थी,15 अक्टूबर 1857 को जब गुरुसिंह,रामनाथ के नेतृत्व में,इधर के जमींदार सोहाग पुर में जमा हुए तो अंग्रेजी सेना,विद्रोहियों के दमन में उलझ गई,इधर सैनिकों के हृदय में देशप्रेम की भावना उमड़ रही थी, जेल की दिवाल में सुरंग बना नारा यण सिंह को कारागार से भागने में पूरी मदद की, खुफिया पुलिस से सूचना डिप्टी कमिश्नर को दूसरे दिन ही मिल गई, तीसरी रेजीमेंट के कमांडर कोजाँच का आदेश दे दिया।इस दौरान नारायणसिंह के वकील के घर की तलाशी ली गई ,परन्तु वहां लांस नायक शमशेर सिंह के नाम लिखे एक कागज के टुकडे के सिवा कुछ भी नही मिला,दयाराम तथा कुछ अन्य कैदियों की मदद से इस बात की पुष्टि हो गई कि लांस नायक और नारा यण सिंह के बीच संपर्क था असिस्टेंट कमिश्नर स्मिथ ने नायक शमशेर सिंह कोकोर्ट मार्शल में दंडित करनाचाहा लेकिन साक्ष्य के अभाव में कमांडिंग अफसर ने स्मिथ के आदेश का पालन नहीं किया, भनक इलियट को लग गई और यह भी मालूम हुआ कि तीसरी रेजीमेंट के सैनिकों में विद्रोह भावना भड़क रही है,उसके आवे दन को नागपुर से दिल्ली भेजा गया और गवर्नर जनरल के आदेश पर स्वीकृति मिलते ही उसे अन्यत्र स्थानांतरित कर दिया गया,नारायण सिंह जानते थे कि विद्रोह की सजा उन्हें मिलेगी ही… उन्होंने सोनाखान में आदि वासियों,जनता के सहयोग से 500 हथियारबंदसैनिकों का गठन किया,रसद,अस्त्र आदि की व्यवस्था की,नाके बंदी के लिए बांस-काठ की दीवारों से सोनाखान के रास्तों को सीलकर दिया, सोनाखान के विद्रोह को दबाना अंग्रेज सरकार की प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया था इलियट को नारायण सिंह के सैन्य संगठन शक्ति, जनता के आकोश का पता लग चुका था इससे निपटने के लिए तैयारी में उसने 20 दिन लगा दिए,उसकेआदेश पर असिस्टेंट कमिश्नर सिग लेफ्टीनेंट नेपियर की सेना लेकर सोनाखान की ओर कूच किया,इसमें 53पुलिस 4 दफ़ेदार, एक जमींदार की सेना शामिल थी, 20 नवम्बर 1857 की घटना है,कुमुक ने खरौद थाने में पड़ाव डाला, स्मिथ को घुडसवार ने नारायण सिंह का जवाबी पत्र लाकर थमा दिया,जिसमें स्वाभिमान, देश प्रेम की अटूट भावना अंकित थी,नारायण सिंह के नेतृत्व मेंआदिवासियों,जमीं दार की मदद से अंग्रेजी सेना के बीच भयंकर युद्ध हुआ, लेफ्टिनेंट स्मिथ 20 नवम्बर 1857 को फौज के रायपुर से सोनाखान के लिए रवाना हुआ,किन्तु मार्गदर्शक के गलत रास्ते पर ले जाने पर 21 नवम्बर 1857 की रात में रायपुर से 70 मील दूर एक गांव में रुकना पड़ा वहां से सोना खान 35 मील दूर थाअगले दिन 18 मील चलकर करांदी गांव पहुंचने पर स्मिथ को ज्ञात हुआ कि सोनाखान के रास्ते परऊंची दीवाल खडीकर नारायण सिंह ने रास्ता रोक दिया है तथा उसकी सेना निपटने को खड़ी है रात्रि में स्मिथ ने नारायण सिंह पर अचानक हमला करने की योजना भी बनाई,करौंदी निवासी बाला पुजारी की सहायता से एक अन्य रास्ते से सोनाखान के लिए वह रवाना हुआ,अर्ध रात्रि में नीतला गांव सेसोना खान के बीच 3 मील तक दुर्गम पहाड़ थे, स्मिथ को जासूस ने समाचार दिया कि घाट पर नारायण सिंह की सेना नाकेबंदी करमोर्चा के लिए तैयार है,स्मिथ बेचन हो उठा, तुरंत कंटगी के कामदार 16 बन्दूक धारियों,वडगांव का जमींदर 25 सैनिकों सहित स्मिथ की सेवा में हाजिर हो गए इसके बाद स्मिथ स्वयं घाट का मुआयना करने निकल पड़ा,विषम परिस्थितियों का पता लगा लिया, पुनः नीमतल्ला वापस हो गया । बिलासपुर को लिखा गया, 50 सैनिकों की टुकड़ी तो नहीं पहुंची पर बिलाईगढ़ का जमींदार सैनिकों सहित वहां पहुंच गया जिन्हें स्मिथ ने घाटों पर तैनात कर दिया ताकि नारायण सिंह को बाहर से किसी प्रकार की मदद न मिल सके,डिप्टी कमिश्वर ने रायपुर से 100 सैनिक और भेजे, इसी बीच मंगल नामक जासूस ने बताया कि देवरी से सोना खान जाने वाले रास्ते की नाकाबंदी अभी पूरी नहीं हुई है,नारायणसिंह के पास 500 हथियारबंद सैनिक और 7 तोपें हैं । स्मिथ ने मोर्चा सम्हालते हुए 80 सैनिक और तैनात किये, 29 नवम्बर की सुबह नीम तल्ला से देवरी के रास्ते सोनाखान के लिए कूच कर दिया, 35 मील चलने के बाद रास्ता भटक जाने के कारण उसे संबलपुर राज्या न्तर्गत एक गांव में रुकना पड़ा,इसके कारण स्मिथ 30 नवम्बर को देवरी पहुंच सका जहां से सोनाखान मात्र 10 मील था। देवरी का जमींदर,जो रिश्ते में नारायण सिंह का काका थे,गद्दार निकले, पुरानी दुश्मनी के चलते स्मिथ की हर प्रकार से सहायता की, 01 दिसम्बर को स्मिथ126 सैनिकों सहित सोनाखान से मात्र 3 मील की दूरी पर पहुंचा इसकी भनक लगने में नारायण सिंह को देरी नहीं लगी, तभी नारायण सिंह की सेना ने गोलियों की बौछार भी शुरु कर दी । स्मिथ,धूर्त-चालाक था, वह कम से कम सैन्य हानि सहता हुआ रास्ता काटकर सोनाखान पहुंचा जो सूना पड़ा था,भविष्य की कल्पना करके नारायण सिंह ने अपने पुत्र गोविंद सिंह,परिजनों,जनता को असवाब सहित बाहर भेज दिया, नारायण सिंह को बाहर से कोई सहायता नहीं मिली,वह चारों तरफ से घिर गये थे, क्रोध में स्मिथ ने समूचे गांव को आग की लपटों के हवाले कर दिया, निरंतर गोलावारी, संघर्ष से नारायण सिंह की मुट्ठी भर सेना यत्र-तत्र बिखर चुकी थी,उन्होंने औरखून-खराबा देखना पसंद नहीं किया ओर स्मिथ के आगे आत्म समर्पण कर दिया।05 दिसम्बर को स्मिथ,नारायण सिंह को हथकड़ी लगाकर डिप्टी कमिश्नर इलियट के हवाले कर दिया। एक छोटी सी अदालती कार्यवाही के बाद अंग्रेजी सरकार के विरुद्ध बगावत करने के आरोप में नारायण सिंह को फांसी की सजा सुना दी गई 10 दिसम्बर 1857 को नारायण सिंह को रायपुर के एक प्रमुख चौराहे पर सरे आम सुबह फांसी दे दी गई, वह बलिदानी स्थान आज छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में जयस्तंभ कह लाता है बाद में प्रतिक्रिया स्वरूप देवरी के जमींदार का जिसके हिस्से सोना खान भी हो गया था, नारा यण सिंह के लड़के गोविन्द सिंह ने गला काटकर पिता का बदला भी ले लिया…!

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