समीक्षा: छत्तीसगढ़ को समझना हो तो पढ़िए पुस्तक “छत्तीसगढ़ अतीत से अब तक”

छत्तीसगढ़ को पिछड़ा, गरीब या कमजोर राज्य समझने वालों को एक बार वरिष्ठ पत्रकार शंकर पांडे जी की नई पुस्तक अवश्य पढ़नी चाहिए। पढ़नी तो उनको भी चाहिए, जो छत्तीसगढ़ से प्यार करते हैं। उनको भी जो सिविल सर्विसेस की तैयारी कर रहे हैं और छत्तीसगढ़ को जानना-समझना चाहते हैं। जिनकी इतिहास, राजनीति, कला, संस्कृति में रुचि है, उनके लिए भी ये एक अच्छी पुस्तक है। वो पत्रकार, जो एक राज्य को आकार लेते हुए उसकी यात्रा में आने वाले पड़ाव को देखना, जानना या समझना चाहते हैं, वे भी इस पुस्तक को पढ़ेंगे तो उनका ज्ञानवर्धन होगा। इस पुस्तक का नाम है “छत्तीसगढ़ अतीत से अब तक”।

आदिकाल से लेकर वर्तमान तक छत्तीसगढ़ को लेकर जितनी भी जानकारियां हैं, इस पुस्तक में समाहित हैं। प्रदेश के बनने, बढ़ने और बदलने की कई सच्ची कहानियां हैं। राजनीति के किस्से हैं, राजाओं की बाते हैं, प्रदेश के नामकरण के कारण बताते तथ्य हैं। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ है, भाजपा है, कांग्रेस है तो सपा और बसपा भी है।

पुस्तक के कुछ किस्से आपको गुदगुदाएंगे, कुछ किस्से चौंकाएंगे तो कुछ सोचने पर मजबूर कर देंगे। पुरातत्व से लेकर छत्तीसगढ़ के साहित्य तक, ब्यूरोक्रेसी से लेकर छत्तीसगढ़-बांग्लादेश संबंधों तक अनेक रोचक जानकारी शंकर सर की किताब में दी हुई है। छत्तीसगढ़ का फिल्मों, नाटकों और दूरदर्शन से क्या नाता रहा है, वह भी हमें जानने को मिलता है।

यह किताब बताती है कि जब सीपी एन्ड बरार (मप्र, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र आदि) के मुख्यमंत्री पंडित रविशंकर शुक्ल भी छत्तीसगढ़ से थे तो नेता प्रतिपक्ष ठाकुर प्यारेलाल सिंह यहीं से थे, और विधानसभा अध्यक्ष भी दुर्ग के घनश्यामदास गुप्ता थे। तीनों एक ट्रेन, एक ही बोगी में बैठकर तब की राजधानी नागपुर जाते थे। विधानसभा में नीतिगत मुद्दों पर एक दूसरे का विरोध करते थे और एक ही बोगी में छत्तीसगढ़ वापस लौटते थे। उस समय राजनेताओं में न केवल मधुर सम्बन्ध होते थे, बल्कि वे एक दूसरे का सम्मान भी करते थे।

किताब से पता चलता है कि कभी सारंगढ़ में एक स्वतंत्र हाईकोर्ट भी था। इसमें लोगों का बरसों तक मनोरंजन करता एकल शो ‘अदरक के पंजे’ का भी जिक्र है तो छत्तीसगढ़ की अमर प्रेम कहानियों, दन्त कथाओं और मंदिरों की कथाएँ भी हैं। देश/प्रदेश के लगभग हर छोटे बड़े नेताओं से जुड़ी घटनाएं भी पुस्तक में दर्ज हैं, जिनका छत्तीसगढ़ से परोक्ष या अपरोक्ष नाता रहा है।

साल्हेकसा और दर्रेकसा नामक रेल स्टेशनों के नामकरण का किस्सा पढ़ते हुए आप मुस्कुराए बिना नहीं रह सकेंगे। जो यह जानना चाहते हैं कि ये नाम ब्रिटिशर्स के समय कैसे रखे गए, उन्हें इस किताब को पढ़ना होगा। इतना दिलचस्प किस्सा शायद ही किसी स्टेशन के नामकरण से जुड़ा होगा।

डॉ एल्विन बेरियर की आदिवासी शोध नायिका कोशी की कहानी हो या पेस्टन जी की कब्र का किस्सा, अविभाजित मध्यप्रदेश के पहले मुख्य सचिव रोनाल्ड नरोन्हा हो या छायावाद के जनक मुकुटधर पांडे, सब कुछ इस एक 326 पृष्ठ की पुस्तक में समाया हुआ है।

प्रदेश के वर्तमान नेताओ से जुड़ी हुई कई महत्वपूर्ण बातें इस पुस्तक में उल्लेखित हैं। रामायण, महाभारत काल से जुड़ी जानकारियां भी हैं। मैं जानबूझकर उन कथाओं का जिक्र यहां नहीं कर रही, ताकि आप पुस्तक लेकर उसे पढ़ें और आनंद लें।

अंत में यही कि, छत्तीसगढ़ को लेकर एक बहुत उम्दा किताब आयी है। किताब को खरीदें। हाल ही में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय ने किताब का विमोचन किया है। शंकर पांडे जी की 45 वर्षों पत्रकारिता का निचोड़ इस पुस्तक में आप पाएंगे। एक पत्रकार की पुस्तक विश्वसनीय होने के साथ-साथ समसामयिक भी होती है। छत्तीसगढ़ अतीत से अब तक आपकी लाइब्रेरी में जरूर होना चाहिए।                  ( पुस्तक समीक्षा ) प्रियंका कौशल
पत्रकार छत्तीसगढ़

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