नई पीढ़ी की राजनीतिक चेतना, लोकतांत्रिक भागीदारी और अहिंसक प्रतिरोध पर हुआ व्यापक विमर्श 
रायपुर । छत्तीसगढ़ी समाज, DOST (Doctors On Street) एवं PURE (Progressive Utilization of Research and Economics) के संयुक्त तत्वावधान में रविवार को गुडविल हॉस्पिटल, सिद्धार्थ चौक, टिकरापारा, रायपुर स्थित सेमिनार हॉल में “जेन-जी आंदोलन के बाद सामाजिक परिवर्तन पर परिचर्चा” का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में जेन-जी आंदोलन की पृष्ठभूमि, नई पीढ़ी की राजनीतिक जागरूकता, लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में युवाओं की भागीदारी, अहिंसक प्रतिरोध तथा भारतीय समाज में लगातार घटित होते रहे सामाजिक परिवर्तनों पर गंभीर और सार्थक चर्चा हुई। 
कार्यक्रम की शुरुआत DOST संस्था के निवर्तमान अध्यक्ष सुनील शर्मा ने की। उन्होंने कार्यक्रम की भूमिका प्रस्तुत करते हुए कहा कि भारतवर्ष के इतिहास में सामाजिक जागरूकता और परिवर्तन की प्रक्रिया निरंतर चलती रही है। कृषि क्रांति से लेकर औद्योगिक क्रांति, स्वतंत्रता संग्राम, लोकतंत्र की स्थापना और उसके विकास की यात्रा से होते हुए आज का जेन-जी आंदोलन भी इसी व्यापक सामाजिक चेतना की एक नई कड़ी के रूप में देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि हर दौर में प्रगतिशील शक्तियों के सामने अनेक चुनौतियां रही हैं, लेकिन भारतीय जनमानस ने समय-समय पर परिवर्तन की आवश्यकता को स्वीकार किया है और समाज को आगे ले जाने वाली नई शक्तियों के लिए जगह बनाई है।
जेन-जी युवाओं ने रखी अपनी बात
परिचर्चा में जेन-जी समुदाय की ओर से संस्कृति ठाकुर, होनेशा ठाकुर एवं अजहान अली ने अपने जोशीले वक्तव्यों के माध्यम से नई पीढ़ी की सोच और आकांक्षाओं को सामने रखा। उन्होंने युवाओं की बदलती सामाजिक और राजनीतिक चेतना, अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता तथा वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों में अपनी भूमिका को लेकर विचार व्यक्त किए। उनके वक्तव्यों में युवा पीढ़ी की बेचैनी के साथ-साथ बेहतर समाज और अधिक उत्तरदायी लोकतंत्र की आकांक्षा भी स्पष्ट रूप से दिखाई दी। 
कार्यक्रम के अतिथि, छत्तीसगढ़ी लोकगीतकार एवं प्रख्यात पत्रकार देवेश ने छत्तीसगढ़ी भाषा में अपना वक्तव्य दिया। उन्होंने जेन-जी आंदोलन की नवीनता तथा इस पीढ़ी में दिखाई दे रही राजनीतिक जागरूकता पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी सामाजिक और राजनीतिक घटनाओं को केवल दूर से देखने वाली पीढ़ी नहीं है, बल्कि वह अपने समय के प्रश्नों पर अपनी स्पष्ट राय रखने और उसे सार्वजनिक रूप से व्यक्त करने की क्षमता रखती है।
उन्होंने जेन-जी की अभिव्यक्ति के नए माध्यमों, उनकी सामाजिक संवेदनशीलता तथा राजनीतिक घटनाक्रम के प्रति उनकी सजगता को वर्तमान समय के महत्वपूर्ण बदलावों के रूप में रेखांकित किया।
लोकतंत्र में परंपरा और समझदारी के साथ भागीदारी जरूरी — डॉ. उदयभान सिंह चौहान
वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता एवं छत्तीसगढ़ में न्याय के लिए निरंतर सक्रिय डॉ. उदयभान सिंह चौहान ने जेन-जी आंदोलन के संदर्भ में लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भागीदारी के महत्व पर विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि किसी भी सामाजिक परिवर्तन को स्थायी और रचनात्मक दिशा देने के लिए परंपरा, अनुभव और नई चेतना के बीच संवाद आवश्यक है। 
उन्होंने युवाओं की ऊर्जा और लोकतांत्रिक संस्थाओं की परिपक्वता के बीच संतुलन स्थापित करने की आवश्यकता पर जोर दिया। उनके अनुसार सामाजिक परिवर्तन केवल विरोध तक सीमित न रहकर लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सार्थक भागीदारी और जिम्मेदारी में भी परिवर्तित होना चाहिए।
आंदोलन की भाषा में आया बदलाव जेन-जी की नई सामाजिक चेतना का संकेत — प्रदीप शर्मा
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि, ग्रामीण विकास एवं योजना सलाहकार प्रदीप शर्मा ने भारतीय इतिहास से लेकर वर्तमान समय तक आंदोलनों की भाषा में हुए बदलाव को रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि सामाजिक आंदोलनों की अभिव्यक्ति समय के साथ बदलती रही है और प्रत्येक नई पीढ़ी अपने समय की परिस्थितियों के अनुरूप परिवर्तन की अपनी भाषा विकसित करती है। 
उन्होंने जेन-जी के जीवन-मूल्यों, अहिंसक प्रतिरोध, सामाजिक सोच और लोकतांत्रिक चेतना में हो रहे विकास पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि जेन-जी को केवल एक आयु-वर्ग के रूप में देखने के बजाय उसके भीतर विकसित हो रही सामाजिक और राजनीतिक चेतना को समझना आवश्यक है।
श्री शर्मा ने भारतीय समाज के लंबे परिवर्तनशील इतिहास के संदर्भ में यह भी रेखांकित किया कि आंदोलनों की शक्ति केवल उनकी तात्कालिक सफलता में नहीं, बल्कि समाज में पैदा होने वाली नई चेतना और विचारों में निहित होती है।
युवा कवि तारिक खान ने कविताओं से बांधा समां
कार्यक्रम में युवा कवि तारिक खान ने अपने काव्य-पाठ से परिचर्चा को एक रचनात्मक और रोचक आयाम प्रदान किया। उन्होंने अपने अंदाज में विभिन्न रचनाओं का पाठ किया, जिसे उपस्थित श्रोताओं ने सराहा। उनके काव्य-पाठ ने कार्यक्रम के गंभीर वैचारिक वातावरण में संवेदना और सृजनात्मकता का सुंदर समावेश किया।
लोकतंत्र की विभिन्न आवाजों का सामाजिक एकत्रीकरण जरूरी — डॉ. सत्यजीत साहू
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे छत्तीसगढ़ी समाज के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. सत्यजीत साहू ने लोकतंत्र में मौजूद विभिन्न आवाजों के सामाजिक एकत्रीकरण की आवश्यकता पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति केवल संस्थाओं में नहीं, बल्कि समाज के विभिन्न वर्गों, विचारों और अनुभवों को संवाद के एक साझा मंच पर लाने में है। उन्होंने कहा कि अलग-अलग विचारों और सामाजिक अनुभवों के बावजूद समाज को जोड़ने वाले सूत्रों की पहचान करना आज की महत्वपूर्ण आवश्यकता है। जेन-जी आंदोलन के संदर्भ में उन्होंने नई पीढ़ी की ऊर्जा, पुरानी पीढ़ी के अनुभव और लोकतांत्रिक मूल्यों को एक साथ लेकर आगे बढ़ने की आवश्यकता पर जोर दिया।
उन्होंने सामाजिक एकता को समानता, संवाद, लोकतांत्रिक सहभागिता और पारस्परिक सम्मान के आधार पर मजबूत करने की बात कही।
नवनियुक्त अध्यक्षों का सम्मान
कार्यक्रम के प्रारंभ में अतिथियों द्वारा DOST संस्था की नवनियुक्त अध्यक्ष डॉ. संगीता कौशिक तथा PURE संस्था की नवनियुक्त अध्यक्ष सुश्री स्वाति देवांगन का शाल एवं श्रीफल से सम्मान किया गया। इस अवसर पर दोनों संस्थाओं की नई जिम्मेदारियों के लिए उन्हें शुभकामनाएं दी गईं।
कार्यक्रम का आरंभ एडवोकेट संतोष ठाकुर द्वारा किया गया। उन्होंने उपस्थित अतिथियों एवं प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए कार्यक्रम के उद्देश्य और इसकी प्रासंगिकता को सामने रखा।
सामाजिक और बौद्धिक क्षेत्र के अनेक लोग हुए शामिल
परिचर्चा में सामाजिक, सांस्कृतिक, पत्रकारिता, चिकित्सा एवं बौद्धिक क्षेत्र से जुड़े अनेक गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे। इनमें सुरज दुबे, आचार्य रितेश्वरानंद अवधूत, के. पी. सिंह, जी. पी. चंद्राकर, स्वराज दास, किशन देवांगन, गुलशन मानसरोवर सहित अनेक नागरिक एवं सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हुए।
कार्यक्रम में उपस्थित प्रतिभागियों ने जेन-जी आंदोलन को केवल एक तात्कालिक घटना के रूप में देखने के बजाय उसे बदलती हुई युवा चेतना, लोकतांत्रिक आकांक्षाओं और व्यापक सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया के संदर्भ में समझने की आवश्यकता पर जोर दिया।
परिचर्चा का समग्र वातावरण संवाद, असहमति के सम्मान और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता से परिपूर्ण रहा। कार्यक्रम ने नई पीढ़ी और समाज के विभिन्न वर्गों के बीच संवाद के लिए एक महत्वपूर्ण मंच प्रदान किया तथा इस बात को रेखांकित किया कि भारत में सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया निरंतर गतिशील है और प्रत्येक पीढ़ी इस यात्रा में अपनी नई भूमिका निर्धारित करती है।