विशाल यादव
पूर्व केंद्रीय मंत्री रहे अरुण यादव की नेता प्रतिपक्ष और पार्टी प्रमुख राहुल गांधी से आम कार्यकर्ताओं को लेकर लगाई गई गुहार ने मध्यप्रदेश की राजनीति में नई हालचल पैदा कर दी है। अपने सोशल मीडिया पोस्ट के माध्यम से दिल्ली तक पार्टी की अंदरूनी लड़ाई पर हस्तक्षेप करने की खुली चिट्ठी अब हर तरफ तैर रही है। अरुण यादव की पोस्ट के बाद कांग्रेस के चाणक्य कहे जाने वाले अर्जुन सिंह का डबरा सम्मेलन को याद ना किया जाए ऐसा हो नहीं सकता। कांग्रेस की गुटबाजी को लेकर अर्जुन सिंह ने बड़े नेताओं को पत्र लिखकर साथ आने को कहा था। इसका मंच था डबरा का एकता सम्मेलन…अविभाजित मध्यप्रदेश में पटवा सरकार के खिलाफ सभी दिग्गज नेताओं को गुटबाजी भुलाकर एक छतरी में लाने का प्रयास आज भी पार्टी में मिसाल के तौर पर याद किया जाता है। इस सम्मेलन की बात इस लिए इस बार हो रही है कि अर्जुन सिंह के बाद कई नेताओं ने समय समय पर पार्टी की गुदबाजी के लिए प्रयास किए पर वो सफल नहीं हो सके। साल 1993 में कांग्रेस की सरकार बनी ये अर्जुन सिंह की सारे नेताओं को साथ लाने का प्रयास और सफल प्रयोग था। लेकिन इसके बाद फिर पार्टी की गुटबाजी धीरे धीरे बढ़ती गई और आज तक नहीं थमी..। प्रदेश की राजनीति में अरुण यादव सरल और सहज राजनेताओं की गिनती में आते हैं । उनकी गुटबाजी पर पीड़ा इस बार खुलकर सामने आ गई। ये दिल्ली तक गुहार उसी का संदेश है कि नीचे से ऊपर तक कांग्रेस को बचा सकते हो तो बचा लो…। बात करें दिग्विजय सिंह के पहले मुख्यमंत्री कार्यकाल की तो इसमें दो उपमुख्यमंत्री बनाए गए थे। आदिवासी नेता जमुनादेवी और किसान नेता सुभाष यादव। सरकार ठीक चली लेकिन इस बीच प्रदेश के दिग्गज नेताओं में टकराव भी खुलकर सामने आया। दूसरी बार कांग्रेस की सरकार बनी तो फिर उपमुख्यमंत्री बनाए जाने का फार्मूला लाया गया लेकिन इस बार सुभाष यादव का जो कद था उससे कई नेताओं की राजनीतिक तकलीफें बढ़ रही थीं। पिछड़े वर्ग की राजनीति में एक दमदार नेता उभर रहा था। ऐसे में एक बार फिर से यादव को उपमुख्यमंत्री की कुर्सी देना कई नेताओं को खटक रहा था। मामला लंबा टल गया। सुभाष यादव ने अपना शक्ति प्रदर्शन इंदौर के मल्हार आश्रम ग्राउंड में करना तय किया। मुख्यमंत्री रहते हुए दिग्विजय सिंह को अंदाजा नहीं था किसानों यह सम्मेलन और सोनिया गांधी की उपस्थिति प्रदेश में नई राजनीति को जन्म देने जा रही है। देर से ही सही यादव को फिर से उपमुख्यमंत्री बनाया गया। अब तक कांग्रेस की राजनीति में छत्तीसगढ़ की राजनीति भी शुक्ल बंधुओं के साथ आदिवासी राजनीति में दखल रखने वाले नेताम बंधुओं के आसपास घूम रही थी। इस बीच यहां मोतीलाल वोरा , डॉ चरणदास महंत, नंद कुमार पटेल, अजीत जोगी सहित कई नेताओं की राजनीति परवान चढ़ रही थी।। मोतीलाल वोरा दिल्ली के करीब हो गए। बाद में छत्तीसगढ़ अलग राज्य बना अजीत जोगी प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री बने। गुटबाजी का एक खेल यहां भी खेला गया । गुटबाजी नहीं थम सकी कांग्रेस के दो बार सत्ता में रहने के बाद जब सड़क पर लड़ने की बात आई तो नेताओं ने अपने इलाके सेफ करने में रुचि दिखाई । अब तक कांग्रेस महाकौशल , विंध्य , ग्वालियर – चंबल के साथ निमाड़- मालवा के नेताओं के नाम पर चलने लगी थी। इस बीच साथ में संगठन में प्रयोग होते रहे अध्यक्ष के तौर पर राधाकिशन मालवीय, सुभाष यादव सहित कई नेताओं ने कमान संभाली लेकिन गुटबाजी कभी जीत की बाजी में तब्दील नहीं हो सकी। साल 2007 – 2008 में केंद्रीय राजनीति में दखल रखने वाले सुरेश पचौरी को संगठन की कमान मध्यप्रदेश में दी गई। तब सत्ता के करीब खड़ी कांग्रेस को फिर गुटबाजी ले डूबी। वजह टिकट बंटवारे और बड़े नेताओं के समर्थकों ने खुलकर बागी होकर चुनाव लड़ा और पार्टी कई सीटों पर कम मार्जिन से हारी। रिपोर्ट नामजद दिल्ली तक भेजी गई पर नतीज़ा सिफ़र ही रहा। अपनों से लड़ती रही कांग्रेस लबे इंतजार में प्रयोग पर प्रयोग होते रहे। संगठन की कमान आदिवासी नेता कांतिलाल भूरिया के पास भी आई । इसके बाद कांग्रेस ने पूर्व केंद्रीय मंत्री रहे अरुण यादव को पीसीसी की कमान सौंप दी । संगठन को सत्ता के करीब ला चुके अरुण यादव भी गुटबाजी का शिकार हुए सबकुछ जमाने के बाद उनके हाथ से पीसीसी की कमान ले ली गई। सीधे दिल्ली से कमलनाथ की एंट्री हो गई। चुनाव हुए कांग्रेस की सरकार भी बनी लेकिन सत्ता में आने के बाद गुटबाजी और आपसी खींच तान में सरकार ही चली गई। ज्योतिरादित्य सिंधिया एक तरफ तो दूसरी तरफ कमलनाथ और दिग्विजय सिंह जैसे दिग्गज नेताओं की पटरी नहीं बैठी। नतीजा सिंधिया अपने विधायक लेकर भाजपा के साथ चल पड़े।
हारे फिर भी दिल्ली ने जताया पटवारी पर विश्वास कमलनाथ की सरकार चली गई । संगठन जैसे तैसे चलता रहा। कुछ समय बाद पीसीसी अध्यक्ष किसे बनाया जाए इसे लेकर बात होती रही। कई नाम सामने आये पर जमीन पर लड़ने वाले नेताओं की सूची में इस बार जीतू पटवारी का नाम सामने आया। पर वक्त ब वक्त गुटबाजी के इस खेल में पिछड़े वर्ग की राजनीति करने वाले नेताओं में शामिल रहे अरुण यादव और जीतू पटवारी दोनों ही गुटबाजी के शिकार रहे । फिलहाल कांग्रेस की राजनीति में जो दिख रहा है वही हो रहा ये जरूरी नहीं है। यहां जो नहीं दिखाई दे रहा है उसे समझने की जरूरत है। वरिष्ठ पत्रकार ओर कांग्रेस नेता पंकज शर्मा की वो बात याद आ रही है जिसमें वो कहते हैं कि कांग्रेस को उन कार्यकर्ताओं पर फोकस करना चाहिए जिनमें कांग्रेस हो..। इधर, इस बार दिल्ली के नेताओं यही समझने की जरूरत है। मीनाक्षी नटराजन के राज्यसभा एपिसोड के बाद बहुत कुछ ठीक करने की जरूरत पर आशा भरी निगाहें कार्यकर्ताओं की राहुल गांधी पर ही हैं।