भूल सुधारने की कोशिश में कहीं चूक न जाए कांग्रेस…!

विशाल यादव   

कांग्रेस का वर्तमान परिदृश्य देखकर साल 1980 याद आ रहा है, जब आविभाजित मध्यप्रदेश में अचानक नया राजनीतिक समीकरण रंग लेने लगा था। वजह कोई और नहीं बल्कि पहली बार आदिवासी समाज को उम्मीद जागी थी कि उनके समाज का पहला मुख्यमंत्री कांग्रेस देने जा रही है। लेकिन कांग्रेस की राजनीति को लेकर कहा जाता है कि यहां जब तक चिटठी न मिल जाए कुछ तय नहीं है। कहते हैं हुआ भी ऐसा ही सारे विधायकों की एक राय के बाद दिल्ली का संदेश आया और मध्यप्रदेश की राजनीति के चाणक्य कहे जाने वाले अर्जुन सिंह को मुख्यमंत्री बनाया गया। उस वक्त मनावर विधानसभा से लगातार आदिवासियों का प्रतिनिधत्व करने वाले शिवभानु सोलंकी सीएम की कुर्सी पाते-पाते केवल डिप्टी सीएम बनकर रह गए। कांग्रेस में एक और नेता नरेश चंद्र तो महज 13 दिन के सीएम बने, लेकिन वो बात फिर और कभी करेंगे।

इन बातों को याद करने के पीछे का कारण सांसद और पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का आदिवासी नेताओं से मुलाकात करना है। इस मुलाकात के बाद राजनीतिक गलियारों का तापमान बढ रहा है। कहने वाले कह रहे हैं कि आने वाले विधानसभा चुनाव में भाजपा की तरह ही कांग्रेस आदिवासी सीएम देने का प्रयोग कर सकती है। कांग्रेस की तीन पीढियों के साथ काम कर चूके पूर्व केंद्रीय मंत्री व वरिष्ठ आदिवासी नेता अरविंद नेताम के आरएसएस के करीब जाने के बाद से बस्तर में समीकरण बदलने का लेकर भी दिल्ली बैठक को जोड रहे हैं।
खैर वजह जो भी हो, लेकिन सबसे ज्यादा बस्तर के आदिवासी नेताओं की उपस्थिति बताती है कि यहां साल 1980 की भूल सुधारने की एक चिंगारी तो कांग्रेस में सुलग चुकी है। लेकिन ये चिंगारी आग का रूप लेती है  या नहीं, ये समय बताएगा। हां, इतना जरूर है कि बस्तर अब तक हर पार्टी को सत्ता के करीब लेकर आया है। इस समय बस्तर में जो चल रहा है कांग्रेस उसे भविष्य में राजनीतिक लाभ का मामला मान कर चल रही है। शायद यह भी एक कारण है कि यहां के नेताओं का जमावडा दिल्ली में किया गया हो।
बात जो भी है, लेकिन ये चर्चा उस समय हो रही है,जब पूरे छत्तीसगढ में तेजी से पिछडा वर्ग का वोट बैंक आकार ले चुका है। खुद कांग्रेस यहां पिछडा वर्ग से भूपेश बघेल को एक बार सीएम बना चुकी है। तो वहीं आविभाजित मध्यप्रदेश से ओबीसी नेताओं में शुमार व दो बार सीएम बनते-बनते रह जाने वाले नेता जो इस समय नेताप्रतिपक्ष की भूमिका में हैं। नेता प्रतिपक्ष डॉ चरणदास महंत पार्टी के पास सबसे ज्यादा गंभीर और अनुभवी नेता हैं। वो कई बार प्रदेशध्यक्ष व चुनाव अभियान समिति के चेहरे रहे हैं। सबसे ज्यादा चुनाव जीतने का रिकॉर्ड और राजनीतिक मिथक तोडने वालों में उनका नाम है। ताम्रध्वज साहु के साथ धनेन्द्र साहु सहित ओबीसी नेताओं की लंबी फहरिस्त है। ये यहां बताना इसलिए जरूरी है कि कांग्रेस कोई भूल सुधार करने की कोशिश कर रही है तो उसे इस समीकरण को भी याद रखना होगा। यानी कोई पुरानी गलती सुधारी तो नई गलती न हो जाए…।
राजनीति में एक चूक कई साल पीछे ले जाती है इसके एक नहीं, कई उदाहरण है। ऐसा लग रहा है कि कांग्रेस अब सामंती राजनीति के प्रभाव से मुक्त होने की कोशिश में है। कई गलतियों को कई साल गुजर जाने के बाद सुधारने की कोशिश वो करती दिखाई दे रही है। लेकिन राजनीतिक जानकार मानते हैं कि अब आदिवासी समाज को साधने में वो देरी कर गई।
आविभाजित मध्यप्रदेश की बात करें तो शिवभानु सोलंकी, अरविंद्र नेताम, जमुना देवी, दिलीप सिंह भूरिया, भंवर सिंह पोर्ते, कांतिलाल भूरिया सहित कई नेताओं का अपना प्रभाव रहा लेकिन सीएम की कुर्सी इन नेताओं से दूर ही रही। छत्तीसगढ़ बनने के बाद एक बार फिर आदिवासी मुख्यमंत्री बनाए जाने की चर्चा चली लेकिन यहां कई दिग्गज नेताओं के अखाडे थे। हर कोई अपनी बनेटी धूमा रहा था। सब प्रदेश का पहला सीएम बनने की कोशिश में लगे रहे। लॉटरी वरिष्ठ नेता अजीत जोगी के नाम निकली। जो तेजतर्रार नेता अर्जुन सिंह के ही सबसे करीबी नेताओं में गिने जाते थे। नए राज्य के बाद सीएम की कुर्सी के करीब जाने वाले नेताओं में वरिष्ठ नेता विध्याचरण शुक्ल, अरविंद नेताम, मोतीलाल वोरा , डॉ चरणदास महंत जैसे नेता फिर पीछे छोड दिए गए।

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