हम अपनी जान की दुश्मन को अपनी जान कहते हैँ... मोहब्बत की इसी मिट्टी को हिंदुस्तान कहते हैँ... - Janmantra

हम अपनी जान की दुश्मन को अपनी जान कहते हैँ… मोहब्बत की इसी मिट्टी को हिंदुस्तान कहते हैँ…

          शंकर पांडे ( वरिष्ठ पत्रकार )    

छत्तीसगढ़ के बालोद जिले के डौंडीलोहारा ब्लॉक के बघमार के जंगलों में छग की राज्य पाल सुश्री अनसुईया उइके की मौजूदगी में लोगों का जमावड़ा लगा रहा…. वहां उपस्थित अधिकतर आदिवासी थे और कंगला मांझी की सेना के सिपाही हैं. इनमें युवा, बुजुर्ग, बच्चे सभी शामिल हैं. ये सभी लोग अपने नेता कंगला मांझी की याद में आयोजित हो रहे कार्यक्रम में शिरकत करने आए थे…..कौन थे कंगला मांझी….?कंगला मांझी एक क्रांतिकारी नेता थे, जिन्होंने आदिवासियों को सशक्त और एकजुट करने में अहम भूमिका निभाई. साल 1913 में वह स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े और 1914 में उनकी मुलाकात महात्मा गांधी से हुई. कांकेर जिले के तेलावट में जन्मे कंगला मांझी राष्ट्रवादी नेता थे. अंग्रेजी शासनकाल में अन्याय से तंग आकर उन्होंने आजाद हिंद फौज की तर्ज पर अपनी सेना का गठन किया था, जिसके सैनिक आजाद हिंद फौज की तरह ही वर्दी पहनते हैं और वर्दी पर स्टार भी लगाते हैं. हालांकि कंगला मांझी की सेना के सैनिकों का रास्ता अहिंसा और शांति वाला है. पर यह सेना विवाद में भी रही…?आजादी के बाद बस्तर में कुछ सैनिक के खिलाफ जुर्म भी दर्ज किया गया था….इन पर समानात्तर सरकार चलाने का आरोप भी लगा था.वैसे अभी भी दावा किया जा रहा है कि देशभर में कंगला मांझी की सेना के करीब 2 लाख सैनिक हैं…. जो आदिवासियों की रक्षा और उनके अधिकारों के लिए काम करते है… पर बस्तर सहित अन्य आदिवासी इलाकों में नक्सली आतंक पर इस सेना ने कोई आंदोलन किया हो ऐसा हाल फिलहाल तो देखने नहीं मिला है….कंगला मांझी स्मृति दिवस कार्यक्रम में शिरकत करने पहुंचे लोगों ने टेंट, पेड़ों के नीचे कड़कड़ाती ठंड में रात गुजारी. 5 दिसंबर को कंगला मांझी स्मृति कार्यक्रम में छत्तीसगढ़ की राज्यपाल ने भी शिरकत की थी. इस दौरान राज्यपाल ने कंगला मांझी की जमकर तारीफ की और आदिवासियों के उत्थान में उनकी भूमिका की खूब सराहना की. वैसे यह तो तय है कि कंगला मांझी के निधन के बाद बिखर गया था संगठन….साल 1984 में कंगला मांझी का निधन हो गया, जिसके बाद उनका ये संगठन कमजोर हो गया. लेकिन 1992 के आसपास महाराष्ट्र में टाडा कानून लागू हुआ था. जिसके चलते रात में नक्सली और दिन में पुलिसकर्मी आदिवासी इलाकों में आते थे. धारा 144 लागू होने के चलते कई ग्रामीणों को पुलिस उठाकर भी ले गई. ऐसे में उत्पीड़न से परेशान होकर कुछ आदिवासी लोगों ने जहर पीकर जान दे दी. ऐसे हालात में कंगला मांझी का संगठन फिर से सक्रिय हुआ और उन्होंने एक बड़ा आयोजन किया. जिसके बाद कंगला मांझी की सेना के सैनिक टाडा कानून के तहत पकड़े गए हजारों आदिवासी लोगों को कानूनी लड़ाई के द्वारा छुड़ाकर ले आए. इस तरह कंगला मांझी की सेना फिर सक्रिय हो गई थी वैसे बस्तर जहां कभी कंगला माझी की समानात्तर सरकार चला करती थी वहां अब यह अस्तित्व ख़ो चुकी है…..

रामनामी समाज याने रामनाम का टैटू….      

भारत विविधताओं से भरा देश है, छत्तीसगढ़ के रामनामी समाज तो लगभग 120 वर्षों से भी अधिक समय से एक विशेष परंपरा का निर्वहन कर रहा है.भगवान राम के ननिहाल याने कौशिल्या के छग में विशेष परंपरा यह है कि रामनामी समाज के लोग अपने पूरे शरीर पर राम नाम के टैटू बनवाते है, वे लोग न तो मंदिर में विश्वास रखते है और ना ही मूर्ति पूजा में…..दरअसल इस परंपरा को बगावत के दृष्टि से भी देखा जाता है.
कहा जाता है कि करीब 120 वर्ष पहले कुछ ऊँची जाति के लोगों ने इस समाज के लोगों को मंदिरों में घुसने पर पाबन्दी लगा दी थी, ठीक इस घटना के बाद लोगों में विरोध की भावना जागी और लोगों ने अपने चेहरे सहित पूरे शरीर पर राम नाम के टैटू बनवाना शुरू कर दिया…
समाज के लोगों को ‘रमरमिहा’ नाम से भी जाना जाता है.छत्तीसगढ़ के सबसे गरीब और पिछड़े इलाकों में से कुछ लोगों के 50/60 साल पहले शरीर पर बने टैटू कुछ धुंधले से हो चुके हैं, लेकिन उनके इस विश्वास में कोई कमी नहीं आई है….l
नई पीढ़ी ने इस परंपरा से खुद को थोडा दूर कर लिया है समय के साथ टैटू बनवाने का चलन कम हुआ है, नयी पीढ़ी ये टैटू बनवाना पसंद नहीं करती…वहां के लोगों का कहना है कि आज की पीढ़ी टैटू नहीं बनवाती इसका मतलब ये नहीं है कि उनका इस पर विश्वास नहीं है. पूरे शरीर पर तो नहीं परन्तु शरीर के किसी हिस्से पर टैटू अवश्य बनवाते है….
रामनामी समाज के नियम के अनुसार समाज में पैदा हुए लोगों को शरीर के कुछ हिस्सों में टैटू बनवाना जरूरी है, खासतौर पर छाती पर और दो वर्ष का होने से पहले….. टैटू बनवाने वाले लोगों को शराब पीने की मनाही के साथ ही रोजाना राम नाम बोलना भी जरूरी है. ज्यादातर रामनामी लोगों के घरों की दीवारों पर राम-राम लिखा होता है. इस समाज के लोगों में राम-राम लिखे कपड़े पहनने का भी चलन है, और ये लोग आपस में एक-दूसरे को राम-राम के नाम से ही पुकारते हैं.
रामनामियों की पहचान राम-राम का टैटू गुदवाने के तरीके के मुताबिक की जाती है, शरीर के किसी भी हिस्से में राम-राम लिखवाने वाले ‘रामनामी’माथे पर राम नाम लिखवाने वाले को ‘शिरोमणि’और पूरे माथे पर राम नाम लिखवाने वाले को ‘सर्वांग रामनामी’और पूरे शरीर पर राम नाम लिखवाने वाले को ‘नखशिख रामनामी’कहा जाता है.रामनामी समाज ने कानूनन रजिस्ट्रेशन कराया है और प्रजातंत्रिक तरीके से उनके चुनाव हर 5 साल के लिए कराए जाते हैं. आज कानून में बदलाव के जरिये समाज में ऊंच-नीच को तकरीबन मिटा दिया गया है!
धर्म-कर्म से ज़्यादा लोग दिखावे में लगे हुए हैं. अब कुछ नहीं कहा जा सकता है कि शायद 5 साल या 10 साल बाद ही उसके बाद…? 120 सालों का रामनामी समाज खत्म हो जाएगा, एक युग खत्म हो जाएगा…..

मप्र के दामाद थे सीडीएस विपिन रावत…     

कुन्नूर के करीब सेना के हेलीकॉप्टर क्रैश में सीडीएस जनरल बिपिन रावत की मृत्यु हो गई है। हादसे में उनकी पत्नी मधुलिका रावत समेत 13 लोगों की मौत हुई है। तमिलनाडु के कुन्नूर में उनका हेलीकॉप्टर हादसे का शिकार हुआ था। भारत के पहले चीफ ऑफ़ डिफेन्स स्टॉफ ( फोर स्टार )जनरल बिपिन रावत मप्र के दामाद थे.उनकी पत्नी मधुलिका सिंह ने शहडोल में तीसरी तक पढ़ाई की थी उसके बाद ग्वालियर के सिंधिया स्कूल में पढ़ी… दिल्ली में कालेज की पढ़ाई की थी. बाद में उनका 1986 में विवाह विपिन रावत से हुआ था. मधुलिका के 2 भाई हर्ष वर्धन सिंह,यशोवर्धन सिंह अभी भी शहडोल में रहते हैं. मधुलिका सोहागपुर रियासत के रियासतदार तथा कांग्रेस के विधायक रहे स्व. मृगेंद्र सिंह की बेटी थी …वैसे विपिन रावत उतराखंड के पौड़ी के रहने वाले थे. विपिन मधुलिका परिवार में दो बेटियां हैँ. एक बेटी का विवाह हो चुका है जबकि छोटी बेटी अभी पढ़ाई कर रही है….

छग में पुलिस कमिश्नर प्रणाली कब….       

मप्र के भोपाल, इंदौर में लागू होगी पुलिस कमिश्नर प्रणाली… अधिसूचना जारी हो गई है.आईजी स्तर के अधिकारी पुलिस कमिश्नर होंगे.अतिरिक्त पुलिस आयुक्त डीआईजी, उप आयुक्त एसपी,अतिरिक्त उप आयुक्त एडिशनल एसपी,सहायक पुलिस आयुक्त डीएसपी का पदनाम तय किया गया है….इंदौर, भोपाल की जनसंख्या 2011की जनगणना के मुताबिक 10लाख से अधिक थी, जाहिर है अब बढ़ गई होगी…वैसे अब छग में भी पहल शुरू हो सकती है…..क्योंकि रायपुर, दुर्ग भिलाई की जनसंख्या 10लाख से अधिक है. इन दोनों शहरों में तो पुलिस आयुक्त प्रणाली लागू की ही जा सकती है… वैसे छग के पहले सीएम अजीत जोगी के समय भी यह चर्चा उठी थी पर नया राज्य बनने तथा उस समय के हालात के चलते बात आगे नहीं बढ़ी थी… अभी के हालात में सीएम भूपेश बघेल विचार तो कर ही सकते हैं….?

छत्तीसगढ़िया को राजधानी की कमान…    

सूरजपुर के भैयाथान के मूल निवासी प्रशांत अग्रवाल को राजधानी रायपुर का एसएसपी बनाया गया है.गांव में प्रायमरी स्कूल की पढ़ाई के दौरान, भैयाथान इलाके में कोई खास सुविधाएं नहीं हुआ करती थीं। उन्होंने नवोदय विद्यालय से पढ़ाई की.भैयाथान की प्राइमरी स्कूल में पढ़ने के दौरान किसी ने प्रशांत अग्रवाल को नवोदय विद्यालय के बारे में बताया था। प्रशांत ने सुन रखा था कि नवोदय विद्यालय में पढ़ाई की बेहतर सुविधाएं हैं। एक पिछड़े इलाके का छात्र होने की वजह से हमेशा उनके मन में कुछ बेहतर करने की कसक रही। यही वजह थी कि उन्होंने नवोदय विद्यालय के लिए चयन परीक्षा दी और उसमें पास भी हुए.
पढ़ाई के दौरान गणित में बेहद दिलचस्पी थी, इसीलिए इंजीनियरिंग की तैयारी की। भारत के श्रेष्ठ इंजीनियरिंग संस्थान आई आई टी खड़गपुर में चयन हुआ। इस संस्थान से इंजीनियरिंग करना स्टूडेंट्स का सपना होता है….। स्नातक होने के दौरान अच्छे परफॉर्मेंस की वजह से प्रशांत के पास मल्टीनेशनल कंपनियों में जॉब के कई ऑफर थे। मगर इसी दौरान प्रशांत अग्रवाल ने तय कर लिया था कि अफसर बन कर लोगों की जिंदगी में कुछ बदलाव करने को ही अपना करियर बनाना है।इंजीनियरिंग के फाइनल ईयर के दौरान ही यूपीएससी की तैयारी शुरू की । पहली बार में कामयाबी नहीं मिली। पर दूसरी बार वे इंडियन पुलिस सर्विस (आईपीएस )के लिए चुन लिए गए। 2008 बैच के आईपीएस प्रशांत अग्रवाल को छत्तीसगढ़ कैडर मिला। नक्सली इलाकों से लेकर, बिलासपुर, दुर्ग जैसे प्रदेश के बड़े शहरों में एसपी की जिम्मेदारी निभा चुके प्रशांत अब राजधानी रायपुर में एस एसपी के तौर पर अपने कैरियर की अहम पारी शुरू कर चुके हैँ.वैसे प्रशांत के पहले छग मूल के स्व. आर सी पटेल, अजय यादव भी राजधानी में पुलिस कप्तानी कर चुके हैँ.

और अब बस…

0डीजी आर के विज के इसी माह सेवानिवृत होने के बाद पुलिस मुख्यालय में बड़ा बदलाव तय है.

0आईपीएस डॉ लाल उम्मेद सिंह दूसरी बार कवर्धा के एसपी बनाए गए हैँ….

0नगरीय निकाय चुनाव में भिलाई में भाजपा के नेताओं के बीच गुटबाजी खुलकर देखने मिली है.

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